गले लगिए, सहज रहिए

गले लगना चाहिए, सहजता आती है। पैर छूने में विज्ञान तलाशते लोग गले लगने को पता नहीं क्यों गम्भीरता से नहीं लेते। लेबर रूम से बाहर आकर हग नहीं मिलता, फेल होने के बाद हग नहीं देता, कोई नहीं होता जो किसी रिश्ते के टूटने के बाद बिना सवाल किए कहे, “आओ गले लग जाओ”

इतनी सहज जरूरत को श्लील – अश्लील बनाकर सिरे से नागवार बता दिया जाता है। ख़ैर, गले लगने पर महसूस होता है, शरीर में घूमता रक्त, धड़कन, गर्मी, बहुत ज़रूरी है आलिंगन, मानसिक स्वास्थ्य के लिए।

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