आपके मनुष्य होने की कसौटी

‘चिकन’ नामक जीव को यों तो कई वैज्ञानिक अध्ययनों में बेहद बुद्धिमान जीव माना गया है – 3-4 वर्षीय इंसानी शिशु के समकक्ष – कुछ अर्थों में तो 6-7 वर्ष भी। मनुष्य की ही भांति इन जीवों को भय, हर्ष, ममत्व, प्रेम अथवा दीर्घकालिक स्मृति से युक्त माना गया है। यों तो इस जीव के पास हम इंसानों को चकित करने के लिए पर्याप्त मेधा है, पर जो गुण मुझे सबसे ज्यादा विस्मित करता है, वह है – संदर्भात्मक संवाद यानी रेफेरेंशियल कम्युनिकेशन।

मानिए, आप और आपका मित्र जंगल में जा रहे हों और आपका मित्र “शेर-शेर” चिल्ला कर भागना शुरू कर दे तो आप भी बिना क्षण व्यर्थ किये अपने मित्र के पीछे-पीछे भाग लेंगे। इस स्थिति में आपको शेर के प्रत्यक्ष होने की आवश्यकता नहीं, सिर्फ “शेर” शब्द सुनना ही आपके मस्तिष्क के लिए खतरे का संदर्भ है। अचरज की बात है कि जब किसी शिकारी पक्षी का चित्र किसी मुर्गे को दिखाया जाए, तो उसकी आवाज सुन कर भी कमरे में बंद अन्य मुर्गे भय भाव का प्रदर्शन करने लगते हैं।

अभी तक 24 ऐसे विशिष्ट संवाद स्वर ढूंढे जा चुके हैं, जिनकी मदद से मुर्गे आपस में भिन्न-भिन्न रूप से संवाद करते हैं और वस्तुस्थिति के अनुसार कैल्कुलटेड निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।

क्या वस्तुस्थिति के आकलन में सिद्ध पाए गए लोहे के पिंजड़ों में बंद ये मुर्गे नहीं समझते होंगे कि जो मुर्गा एक बार बाड़े से बाहर निकला, उसकी वापसी संभव नहीं? क्या गर्दन पर चलते नश्तर की पीड़ा से चीखते अन्य मुर्गों का क्रंदन ये न बूझते होंगे? मुर्गे तो गिनती भी जानते हैं। क्या वे उन 40 दिनों में अपने साथियों के हश्र के आधार पर अनुमान न लगा पाते होंगे कि हर बीतते दिन के साथ उनकी मृत्यु का समय नजदीक आता जा रहा है? ऐसी स्थिति में पदचापों की आहट मात्र ही जीव की चेतना को आतंक से भर देती है। यह अकारण ही तो नहीं होगा कि कत्लखानों में इन जीवों का कोलाहल हर समय गूंजता ही रहता है?

एक अभागा जीव, जिसकी पैदा होते ही निर्ममता से चोंच काट दी गयी। उस घाव की असहनीय पीड़ा को सहने योग्य भी न हुआ और उठा कर उन तंग पिंजरों में फेंक दिया गया, जहां जीवनपर्यंत मलमूत्र के बीच ठीक से हिलने या बैठने तक की आजादी न थी। उसके बाद हर दिन सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा के अलावा उसके जीवन में क्या शेष बचा?

हर साल सिर्फ 70 अरब चिकन आपकी डिनर प्लेट का हिस्सा बनने के लिए इस नियति से गुजरते हैं – अन्य जीवों की तो गिनती कर ही नहीं रहा।
70 अरब, यानी दिन में 20 करोड़, हर मिनट में लगभग 1 लाख 40 हजार….

आसन्न मृत्यु की बेला में वध की प्रतीक्षा कर रही भयाक्रांत असहाय चेतना की कल्पना कर हृदय में आवेग पैदा होने की बजाय आपके मन में पहला सवाल यह आता होगा!
बस यही जवाब आपके मनुष्य होने की कसौटी पर खरा उतरता है।

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