हरिद्वार की उप नगरी कनखल स्थित हरिहर आश्रम के प्रबंधक व जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद जी के जन्म दिवस के मौके पर उनके द्वारा चंपावत में संचालित शिक्षण संस्था के छात्र-छात्राएं व अध्यापक , अध्यापिकाएं स्वामी जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए कनखल स्थित हरिहर आश्रम पहुंचे थे। स्वामी जी के अनुसार इंटरमीडिएट तक सीबीएससी बोर्ड से एफ़िलेटिड संस्था को निशुल संचालित किया जाता है।

स्वामी अवधेशानंद शिक्षण संस्थान चंपावत में 200 से अधिक छात्राएं शिक्षा ग्रहण करते हैं।सभी बच्चो को स्वामी जी ने ले रखा है गोद।
इस शिक्षण संस्थान में 7 अध्यापिकाएं व आठ शिक्षक भी बच्चों को शिक्षा प्रदान करते हैं ,स्वामी अवधेशानंद के अनुसार इन सभी बच्चों को उन्होंने गोद ले रखा है, और उनका एक ही सपना है।

कि यह बच्चे पढ़ लिखकर अच्छे-अच्छे पदों पर पहुंचकर अपना जीवन यापन करें ,व सनातन धर्म व आध्यात्म का भी प्रचार प्रसार करें, इनमें सभी छात्र-छात्राओं को संस्कारवान बनाने के लिए कुशल शिक्षक व शिक्षिकाओं के नेतृत्व में इनको शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है। इन सभी बच्चों को स्वामी अवधेशानंद जी ने गोद ले रखा है। यह बच्चे स्वामी अवधेशानंद जी के जन्मदिन पर स्वामी जी को बधाई देने कनखल के हरिहर आश्रम पहुंचे थे।

सभी बच्चो अध्यापक, अध्यापिकाओं को स्वामी जी ने उपहार स्वरूप दिए गर्म कपड़े व नकद धनराशि।
यहां पहुंचने पर स्वामी जी ने इन सभी बच्चों के लिए क्योंकि पहाड़ में ठंड ज्यादा होती है इसलिए सभी बच्चों के लिए जूते मोजे ग्लव्स जर्सी चश्मे और ठंड से बचने के लिए जितनी भी चीज हो सकती हैं ।सभी वस्तुओं को बच्चों के लिए उपलब्ध कराया हैं। और साथ ही शिक्षिकाओं व शिक्षकों के लिए भी उपहार स्वरूप यह चीज उपलब्ध कराई हैं ।और सभी बच्चों को प्रसाद वह नकद धनराशि भी प्रदान की है, बच्चे महाराज जी से मिलकर बेहद प्रसन्न थे और शिक्षिकाएं और शिक्षक भी महाराज जी को नमन कर रहे थे।

बच्चो को चाट पकौडी व पानी बताशे भी खिलवाये।
स्वामी अवधेशानंद जी ने अपने हरिहर आश्रम के सेवकों को निर्देश दिया कि सभी बच्चों को बाजार ले जाकर उनकी मनपसंद के कपड़े जो भी चीज जूते जो भी चीज चाहे वह दिलवा की जाए वह उनको बाजार में चार्ट पकौड़ी और खासकर अपनी बता दो का स्वाद जरूर दिलवाया जाए स्वामी जी की इस उदारता को देख आश्रम में मौजूद जहां तमाम लोग अभी भूत थे वहीं खुद यह पत्रकार भी स्वामी जी की इस उदारता को देख वास्तव में स्वामी जी को एक तक निहार रहा था क्योंकि स्वामी जी के और मेरे विगत 35 वर्षों से संबंध है लेकिन इस तरीके का स्वरूप स्वामी जी का मुझे भी पहली बार देखने को मिला है।
स्वामी जी ने एक बात अपने सेवकों को और कहीं की इन बच्चों को आइसक्रीम भी खिलाई जाए क्योंकि पहाड़ में बहुत अच्छी आइसक्रीम नहीं मिलती है इसलिए किसी बहुत अच्छी आइसक्रीम पार्लर पर ले जाकर इनको आइसक्रीम का भी स्वाद दिलाया जाए उनको आइसक्रीम खिलाया जाए इस तरीके के संतो के कार्यों को देखकर लगता है कि वास्तव में अभी भी संतो के वश में मानवता जीवित है तभी यह सोने की चिड़िया कहलन वाला भारत देश निरंतर आगे बढ़ रहा है






