कड़ी तपस्या व पीड़ा के बाद बनते हैं ‘नागा’

कहा जाता है कि जब जब देश पर संकट आया तब तब नागाओं ने देश की रक्षा की। मोहम्मद शाह अब्दाली के ख़िलाफ़ इन्होंने युद्ध करके बता दिया कि हम किसी से कम नहीं और देश के लिए हर रूप में तत्पर हैं।

नागा साधु क्या होते हैं? दरअसल शैव पंथ के यह 7 अखाड़ों द्वारा देश में होने वाले चार कुंभ में एक विशेष प्रक्रिया के तहत नागा साधु बनाया जाता है।

इन चार प्रमुख कुंभों में नागा साधु बनने पर उन्हें अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले को नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा और नासिक में खिचड़िया नागा कहा जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि साधु को किस कुंभ में नागा की उपाधि मिली है।

नागा साधु बनने के लिए 12 वर्ष का समय लगता है। जिसमें नागा साधुओं को सबसे पहले यह सातों अखाड़े ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा देते हैं। 2-3 साल के इस दौर में अगर यह पाया जाए कि साधु नियम मानने में कोताही बरत रहा है, या फिर भटक रहा है तो उसे परिवार में वापस लौट जाने को कह दिया जाता है।

इस परीक्षा को पास करने के बाद दीक्षा दी जाती है। इसके बाद की परीक्षा यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है।

अंतिम परीक्षा दिगम्बर और श्रीदिगम्बर की होती है। दिगम्बर नागा एक लंगोटी पहन सकते हैं, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े के रहना होता है और उनकी इन्द्रियाँ तोड़ दी जाती हैं।

दरअसल इंद्रियों के तोड़ने की इस प्रक्रिया में सबसे पहले एक क्रिया पंचकेश होता है जिसके तहत शरीर के सभी भागों के बाल उतार दिया जाता है फिर “लिंग तोड़क” या “तंगतोड़” किया जाता है। यह एक बेहद कष्टकारी प्रक्रिया होती है जिसमें व्यक्ति कई दिनों तक तड़पता रहता है।

अखाड़े इसे शारीरिक और मानसिक तपस्या का चरम रूप मानते हैं और‌ इस क्रिया के बाद उन्हें कुंभ के दौरान अपना पिंडदान करना पड़ता है, जिसका मतलब है कि वह अपने पिछले जीवन से मुक्ति पा लेते हैं और फिर ब्रह्म मुहूर्त में 108 बार कुंभ की डुबकी लगाई जाती और फिर विजया हवन करके उन्हें “नागा” की उपाधि दी जाती है।

“नागा” की उपाधि के बाद साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव पद दिए जाते हैं जिनमें सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद महंत का होता है।

नागा साधु सुबह चार बजे उठकर नित्य क्रिया और स्नान करते हैं और फिर श्रृंगार करते हैं। इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया और नौली क्रिया करते हैं। पूरे दिन में एक बार शाम को भोजन करते हैं और फिर बिस्तर पर चले जाते हैं।

नागा साधु 17 श्रृंगार करते हैं‌ जिनमें लंगोट, भभूत, चंदन, लोहे या चांदी के कड़े, अंगूठी, पंचकेश, कमर में माला, माथे पर रोली, कुंडल, चिमटा, डमरू, कमंडल, गुथी हुई जटाएं, तिलक, काजल, हाथों में कड़ा, और बाहों में रुद्राक्ष की मालाएं शामिल हैं।

महानिर्वणी अखाड़ा, जूना अखाड़ा और निरंजनी अखाड़ों में सबसे अधिक नागा साधु होते हैं। नागा साधु केवल शिव के भक्त होते हैं और वह किसी अन्य देवता को नहीं मानते। नागा साधुओं का एक मात्र अभिवादन मंत्र है “ॐ नमो नारायण”।

कुंभ के बाद, ये साधु तपस्या के लिए हिमालय की ओर जाते हैं और यहां वह कठोर तप और संन्यासी जीवन के कठिन प्रशिक्षण से गुजरते हैं। यह प्रशिक्षण शास्त्र और शस्त्र दोनों का होता है और अगले कुंभ तक ये साधु वहीं रहते हैं। कुंभ में लौटने पर इन्हें नई जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं।

जब महिलाएं संन्यास में दीक्षा लेती हैं तो उन्हें भी नागा साधु बनाया जाता है, लेकिन वह सभी वस्त्रधारी होती हैं। जूना अखाड़े ने ‘माई बाड़ा’ को दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा का स्वरूप प्रदान किया और यह वहीं रहतीं हैं। इन महिला साधुओं को ‘माई’, ‘अवधूतानी’ कहा जाता है। उन्हें किसी विशेष इलाके में प्रमुख के रूप में ‘श्रीमहंत’ का पद भी दिया जाता है।

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