नाबालिग को मोहरा बनाकर रचा गया कथित षड्यंत्र, चम्पावत की सादगी और संस्कारों पर लगा दाग।
उत्तराखंड का शांत, सरल और सांस्कृतिक मूल्यों से परिपूर्ण सीमांत जनपद चम्पावत इन दिनों एक ऐसे घटनाक्रम से आहत है, जिसने पूरे जिले को भीतर तक झकझोर दिया। प्राकृतिक सौंदर्य, सामाजिक सौहार्द और देवी संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले इस जिले को एक कथित सियासी षड्यंत्र ने ऐसी बदनामी दी कि लोग आज भी स्तब्ध हैं। जिस प्रकार एक नाबालिग बालिका को कथित रूप से मोहरा बनाकर पूरे घटनाक्रम को हवा दी गई, उसने न केवल जिले की छवि को धूमिल किया बल्कि उस सामाजिक ताने-बाने को भी चोट पहुंचाई, जहां बेटियों को देवी स्वरूप मानकर पूजने की परंपरा सदियों से जीवित है। चैत्र और अश्विन नवरात्रों में हर घर में कन्याओं का पूजन करने वाली इस देवभूमि में एक बालिका के भविष्य को कथित राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश को लेकर लोगों में भारी आक्रोश है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि चम्पावत की पहचान कभी भी इस प्रकार की ओछी राजनीति नहीं रही। यहां की संस्कृति, संस्कार, सादगी और मानवीय संवेदनाएं हमेशा इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत रही हैं। ऐसे में जिले को बदनाम करने वाले घटनाक्रम ने हर उस व्यक्ति को मानसिक पीड़ा दी है, जिसकी जड़ें इस मिट्टी से जुड़ी हैं चाहे वह आज रोज़गार के लिए महानगरों में क्यों न रह रहा हो। लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा चम्पावत को मॉडल जिला बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन और रोजगार जैसे क्षेत्रों में तेजी से हो रहे विकास के बीच इस तरह की घटना ने जिले की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है। इस घातक मनोवृत्ति ने जन भावनाओं से आत्मसात करते आ रहे मुख्यमंत्री को कितना गहरा आघात लगा होगा। इसकी अनुभूति हर समझदार व्यक्ति कर सकता है।
महिला पुलिस अधीक्षक द्वारा पूरे मामले में की गई प्रेस ब्रीफिंग के बाद लोगों को बड़ी मानसिक राहत मिली। पुलिस ने जिस तरह तथ्यों के आधार पर पूरे घटनाक्रम का खुलासा करते हुए कथित षड्यंत्र की परतें खोलीं और संबंधित लोगों को कानूनी शिकंजे में लिया, उससे कई सवालों के जवाब सामने आए।bहालांकि, लोगों के बीच यह सवाल अब भी गूंज रहा है कि जिले की जो बदनामी हुई, उसका दाग आखिर कौन मिटाएगा?
घटनाक्रम में विपक्षी राजनीति को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। आम जनमानस का कहना है कि बिना मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस जांच की प्रतीक्षा किए जिस प्रकार बयानबाजी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप किए गए, उससे चम्पावत की छवि को अनावश्यक नुकसान पहुंचा। लोगों का मानना है कि यदि तथ्यों के सामने आने तक संयम बरता जाता, तो शायद जिले को इस शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़ता। फिलहाल पुलिस खुलासे के बाद पूरे घटनाक्रम को लेकर बनी तमाम आशंकाएं और चर्चाएं धीरे-धीरे साफ होती नजर आ रही हैं, लेकिन इस प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनैतिक लाभ के लिए किसी भी हद तक जाना अब सामान्य होता जा रहा है? भले ही इसका प्रभाव समाज, व्यवस्था व राष्ट्र पर कितना पड़ रहा होगा। इस विषय को ठंडे दिमाग से सोचने की आवश्यकता है।





