बाहर से दवाइयां मंगाने पर सख्ती, कार्य बहिष्कार से बढ़ी मरीजों की परेशानी

संजू पुरोहित सम्पादक

डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप माना जाता है, लेकिन जब सरकारी अस्पताल में उपलब्ध दवाइयों के बावजूद मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदने के लिए कहा जाए तो सवाल उठना लाजिमी है। लगातार मिल रही शिकायतों के बाद जिलाधिकारी मनीष कुमार ने खुद एक सामान्य मरीज की तरह जिला अस्पताल पहुंचकर व्यवस्थाओं की हकीकत परखी। निरीक्षण के दौरान सामने आया कि अस्पताल में दवाइयां उपलब्ध होने के बावजूद कुछ मरीजों को बाजार से दवाएं लाने के लिए कहा जा रहा था। मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी ने चिकित्सालय प्रबंधन को स्पष्ट निर्देश दिए कि बाहर से दवाइयां मंगाने की प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगाई जाए। उन्होंने कहा कि शासन एक व्यक्ति का जीवन बचाने के लिए सभी संसाधन उपलब्ध करा रहा है, जन औषधि केंद्र संचालित है और जिला प्रशासन अस्पताल की हर आवश्यकता पूरी कर रहा है। ऐसे में गरीब मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना कतई उचित नहीं है।

डीएम की सख्ती के बाद कुछ चिकित्सकों द्वारा कार्य बहिष्कार जैसा कदम उठाए जाने से दूरदराज क्षेत्रों से आए मरीजों की बेचैनी बढ़ गई। अचानक लिए गए इस निर्णय से अस्पताल में उपचार व्यवस्था प्रभावित हुई और मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ा। बिना पूर्व सूचना कार्य बहिष्कार को लेकर आम जनता में नाराजगी भी देखी गई। प्रमुख राज्य आंदोलनकारी एडवोकेट नवीन मुरारी सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी के कदम का समर्थन करते हुए कहा कि चिकित्सा सेवा सौभाग्य का कार्य है, इसे छोटी-छोटी बातों पर बाधित करना उचित नहीं। उनका कहना है कि यदि कोई समस्या थी तो उसे प्रशासन या मुख्य चिकित्सा अधिकारी के संज्ञान में लाया जाना चाहिए था।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. देवेश चौहान ने कहा कि मामला इतना गंभीर नहीं था कि कार्य बहिष्कार की नौबत आती। उन्होंने स्वीकार किया कि घटना की समय पर जानकारी नहीं मिल पाई और मरीजों को हुई असुविधा पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी जाएगी। जिलाधिकारी मनीष कुमार की कार्यशैली को लेकर आम जनता में विश्वास दिखाई दे रहा है। रोजाना लंबे समय तक कार्य करने वाले इस अधिकारी ने प्रशासन की अलग पहचान बनाई है। बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने यह संदेश जरूर दिया है कि अस्पताल की गरिमा, सेवा भाव और मरीजों की संवेदनाओं को सर्वोपरि रखते हुए सभी पक्षों को समन्वय के साथ कार्य करना होगा, ताकि किसी भी रोगी को इलाज के लिए भटकना न पड़े।

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