‘कविता कारवां’ में सुर, शब्द और संवेदनाओं का संगम

रुड़की- हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में देर कल शाम नवसृजन साहित्यिक संस्था रुड़की की काव्य गोष्ठी ‘कविता कारवां’ में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के उपकुलपति डॉ श्रीगोपाल नारसन ने हिंदी सेवाओं के लिए वरिष्ठ साहित्यकार सुरेंद्र कुमार सैनी को शाल ओढ़ाकर व स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।वही नवसृजन साहित्यिक संस्था की ओर से पांच वरिष्ठ साहित्यकारों  सुबोध पुंडीर ‘सरित्’, डॉ आनंद भारद्वाज ,डॉ श्रीगोपाल नारसन ,डॉ घनश्याम बादल एवं  कृष्ण सुकुमार सम्मानित हुए।  घनश्याम बादल ने अभी तक भी हिंदी को  राष्ट्रभाषा का सम्मान ना देने  तथा उसके समुचित उत्थान के प्रति संबंधित सरकारों की लापरवाही के लिए अपना आक्रोश जाहिर  किया।वही श्री गोपाल नारसन ने बताया कि आठवीं शताब्दी में स्थापित विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ किस तरह से निरंतर अनेक कठिनाइयों के बावजूद हिंदी के प्रचार- प्रसार में अपना योगदान कर रही है। उन्होंने बावन अक्षरों की हिंदी/स्वर- व्यंजन की हिंदी’ कविता भी सुनाई।
उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा निदेशक डॉ आनंद भारद्वाज ने कहा कि संस्कृत ही हिंदी भाषा की जननी है और संस्कृत से ही हिंदी समृद्ध और सर्वग्राह्य बनी है। वही शाहिद शेख के गीत ‘है इसी में प्यार की आबरू’, सुरेंद्र कुमार सैनी की कुण्डलिया ‘आता है इक साल में हिंदी दिवस महान’  सुबोध पुंडीर ‘सरित्’ द्वारा कृष्ण बिहारी नूर की ग़ज़ल ‘जिंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं/और क्या ज़ुर्म है पता ही नहीं ‘ सुनाई तो सदन तालियों से गूॅंज गया।  कृष्ण सुकुमार की प्रस्तुति ‘मैंने वह शाम बेच दी, बेच दी, बेच दी’ , ग़ज़लकार  पंकज त्यागी ‘असीम’ द्वारा अदम गोंडवी की ग़ज़ल वो जिसके हाथ में छाले हैं, पैरों में बिवाई है/ उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है’, रश्मि त्यागी ने जब ‘रह जाता कोई अर्थ नहीं’ नामक कविता सुनाई तो माहौल थोड़ा संजीदा हो गया।आदित्य सक्सेना ने  काका हाथरसी की फुलझड़ियाॅं सुनाई तो नवीन शरण निश्चल ने  स्वर्गीय जगदीश शरण की रचना ‘भीष्म  पितामह  पड़े हुए थे सर सैया पर/ पांडव चारों ओर खड़े थे सर नीचा कर’ सुनाई ।अनिल वर्मा अमरोहवी , देहरादून से पधारे फरहान हैदर व दानिश सिद्दिकी ने भी अपने गायन के रंग बिखेरे।  कार्यक्रम में सौ सिंह सैनी, श्रीमती अल्का घनशाला श्रीमती अनुपमा गुप्ता, श्रीमती अनुपमा शर्मा,  गोपाल शर्मा मुकेश वशिष्ठ ,अर्चना त्यागी,निशा सक्सेना, अरविन्द भारद्वाज तथा श्याम कुमार त्यागी ने भी  काव्यपाठ किया।
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