ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

उच्च कोटि के रचनाकार जब कुछ रचते हैं तो वो धार्मिक और सांस्कृतिक सरहदों के पार जाकर रचते हैं। धर्म या राष्ट्र की संकीर्ण दृष्टि से वो परे होते हैं। कला में निरपेक्षता बहुत ज़रूरी है। कला में अगर कोई इंसान सांप्रदायिक है तो वो कुछ भी रच दे, फौरी तौर पर सफल हो जाए, लेकिन समय का तूफ़ान अंततः उसे उड़ा ले जाएगा।

कोई साम्प्रदायिक है तो वो अच्छा कवि नहीं हो सकता, कोई कट्टर है तो अच्छी कहानी नहीं लिख पायेगा, वर्ण-व्यवस्था के समर्थक के पास रचने के लिए बस कचरा होगा, रंगभेद का समर्थक किसी के दिल को नहीं छू पाएगा।

तो आगे आने वाले रचनाकारों ने बार-बार ईसा मसीह के इस प्रतीक को दिखाकर ना सिर्फ़ उस अन्याय को याद दिलाया है, बल्कि इस दुनिया में हो रहे सतत् अत्याचारों के खिलाफ इसी तरह के ढेर सारे प्रतीकों के ज़रिए अपनी आवाज़ उठाई है।

वो अत्याचार जो एक आम आदमी को बेरोजगार और भूखा रखकर किए जा रहे हों या उसकी प्रतिभा का नाश करके। अवसरों से महरूम रखना अत्याचार की हद है। कोई इंसान जो अपनी प्रतिभा के दम पर ऊँचाइयाँ छू सकता हो और समाज उसे मंच ही ना दें, ये क्रूरता है।

थॉमस जेफ़र्सन ने जब अमेरिकी संविधान में “pursuit of happiness” का इस्तेमाल किया तो तब तो इसका मतलब यही था कि अमेरिका अपने हर नागरिक को एक सार्थक जीवन जीने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध करवाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।

रोटी, कपड़ा और मकान तो मूलभूत इंसानी ज़रूरतें हैं ही, लेकिन अपने सपनों को पूरा करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना भी इंसान का मूलभूत जज़्बाती हक़ होना ही चाहिए।

अन्यथा एक कलात्मक ह्रदय यही कहकर दुनिया से रुख़सत हो जाता है,

“जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है”

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